Shri Ekadasa Mukha Hanumath Kavacham हिंदू धर्म में हनुमान जी के ग्यारहवें रुद्र अवतार को शक्ति और साहस का सर्वोच्च शिखर माना गया है। Shri Ekadasa Mukha Hanumath Kavacham (ग्यारह मुखी हनुमान कवच) एक ऐसी गुप्त और अत्यंत शक्तिशाली साधना है, जो भक्त को हर दिशा से सुरक्षा प्रदान करती है।
शास्त्रों के अनुसार, ग्यारह मुखी हनुमान जी साक्षात भगवान शिव के ग्यारह रुद्रों की शक्ति को समाहित किए हुए हैं। यदि आप अपने जीवन में Unstoppable Success, शत्रुओं का पूर्ण विनाश और Planetary Peace चाहते हैं, तो यह कवच आपके लिए एक Ultimate Spiritual Shield साबित होगा।
श्री एकादशमुख हनुमत्कवचम्
श्रीदेव्युवाच ।
शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च ।
कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ १ ॥
श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च ।
किञ्चिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ २ ॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ।
हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ ३ ॥
एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् ।
जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ ४ ॥
अस्य श्रीएकादशवक्त्र हनुमत्कवचमालामन्त्रस्य वीररामचन्द्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता, ह्रीं बीजं, ह्रौं शक्तिः, स्फें कीलकं, सर्वदूतस्तम्भनार्थं जिह्वाकीलनार्थं मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी भूत प्रेतादि बाधापरिहारार्थं श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामन्त्रजपे विनियोगः ॥
करन्यासः –
ओं ह्रौं आञ्जनेयाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ओं स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ओं स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ओं ह्रौं अञ्जनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ओं स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ओं ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
अङ्गन्यासः –
ओं ह्रौं आञ्जनेयाय हृदयाय नमः ।
ओं स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ओं स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ओं ह्रौं अञ्जनीगर्भाय कवचाय हुम् ।
ओं स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ओं ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् ।
ध्यानम् –
ध्यायेद्रणे हनुमन्तमेकादशमुखाम्बुजं
ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनम् ।
हाहाकारैः सदर्पैश्च कम्पयन्तं जगत्त्रयं
ब्रह्मादिवन्दितं देवं कपिकोटिसमन्वितम् ॥
एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥
दिग्बन्धाः –
ओं इन्द्रदिग्भागे गजारूढ हनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १
ओं अग्निदिग्भागे मेषारुढ हनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ २
ओं यमदिग्भागे महिषारूढ हनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ३
ओं निरृतिदिग्भागे नरारूढ हनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ४
ओं वरुणदिग्भागे मकरारूढ हनुमते प्राणशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ५
ओं वायुदिग्भागे मृगारूढ हनुमते अङ्कुशशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ६
ओं कुबेरदिग्भागे अश्वारूढ हनुमते गदाशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ७
ओं ईशानदिग्भागे राक्षसारूढ हनुमते पर्वतशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ८
ओं अन्तरिक्षदिग्भागे वर्तुलारूढ हनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ९
ओं भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढ हनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १०
ओं वज्रमण्डले हंसारूढ हनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौर व्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ११
मालामन्त्रः –
ओं ह्रीं यीं यं प्रचण्डपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते हंसयतिबन्ध मतिबन्ध वाग्बन्ध भैरुण्डबन्ध भूतबन्ध प्रेतबन्ध पिशाचबन्ध ज्वरबन्ध शूलबन्ध सर्वदेवताबन्ध रागबन्ध मुखबन्ध राजसभाबन्ध घोर वीर प्रताप रौद्र भीषण हनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय वज्र कुण्डल कौपीन तुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १ ॥
ओं श्रीवीरहनुमते नमः । ओं नमो भगवते वीरहनुमते पीताम्बरधराय कर्णकुण्डलाद्याभरणालङ्कृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय
कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय श्रीवीररामचन्द्रमनोऽभिलषिताय लङ्कादिदहनकारणाय घनकुलगिरिवज्रदण्डाय अक्षकुमारसंहारकारणाय ओं यं ओं नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥ २ ॥
ओं ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय अञ्जनीगर्भसम्भूताय शाकिनीडाकिनीविध्वंसनाय किलिकिलिबुबुकारेण विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ओं ह्रीं श्रीं ह्रौं ह्रां फट् स्वाहा ॥ ३ ॥
ओं श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ओं श्रीवीरहनुमते स्फ्रें हूं फट् स्वाहा ।
ओं श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ओं श्रीवीरहनुमते स्फ्रें फट् स्वाहा ।
ओं ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ओं श्रीवीरहनुमते ह्रैं हूं फट् स्वाहा ।
ओं ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते लं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते रं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते मं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं नैरृतिमुखे वराहमुखहनुमते क्षं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते वं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते यं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते सं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं आं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते आं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते ह्रीं सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ।
ओं सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते स्फ्रें सकलशत्रुसंहारकाय हूं फट् स्वाहा ॥ ४ ॥
ओं श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय भानुमण्डलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय
महाभयरक्षकाय यं हौम् । ओं ह्स्फें ह्स्फें ह्स्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन्
मां रक्ष रक्ष शान्तिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु महालक्ष्मीं देहि हूं फट् स्वाहा ॥ ५ ॥
फलश्रुतिः –
इत्येतत् कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् ।
यः पठेत् प्रयतो भूत्वा सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ १ ॥
द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः ।
रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥ २ ॥
मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि ।
क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥ ३ ॥
यः पठेत् कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः ।
त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥ ४ ॥
देवमभ्यर्च्य विधिवत् पुरश्चर्यां समारभेत् ।
एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥ ५ ॥
यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् ।
ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥ ६ ॥
गद्यपद्यमयी वाणी तस्य वक्त्रे विराजते ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
इति श्रीरुद्रयामले श्री एकादशमुख हनुमत्कवचम् ॥
Shri Ekadasa Mukha Hanumath Kavacham PDF Download
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एकादशमुख हनुमान कवच क्या है? (What is Ekadasa Mukha Hanumath Kavacham?)
‘एकादश’ का अर्थ है ग्यारह और ‘मुख’ का अर्थ है चेहरा। Ekadasa Mukha Hanuman स्वरूप में बजरंग बली के ग्यारह मुख होते हैं, जो दसों दिशाओं और आकाश की रक्षा करते हैं। यह कवच अगस्त्य संहिता (Agastya Samhita) से लिया गया है और इसे Master Key of Protection माना जाता है।
यह कवच केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि एक Energy Armor है जो आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के चारों ओर एक Positive Aura विकसित कर देता है।
श्री एकादशमुख हनुमत्कवचम् के अद्भुत लाभ (Top Benefits)
इस दिव्य कवच का पाठ करने से भक्तों को मिलने वाले Spiritual and Material benefits निम्नलिखित हैं:
- Removal of Graha Dosha: यह कवच विशेष रूप से शनि, राहु और केतु के Negative impacts को पूरी तरह शांत कर देता है।
- Victory in Battles: चाहे जीवन का संघर्ष हो या कोर्ट-कचहरी के मामले, यह आपको Victory over enemies दिलाता है।
- Astavinayak & Rudra Blessings: ग्यारह मुखी स्वरूप का पाठ करने से ग्यारह रुद्रों और सभी देवताओं की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है।
- Mental Clarity: यदि आप Anxiety या निर्णय लेने की क्षमता में कमी महसूस करते हैं, तो यह पाठ आपको Supernatural Focus प्रदान करता है।
- Fulfillment of Desires: इसे ‘कार्य सिद्धि कवच’ भी कहा जाता है क्योंकि यह सभी रुके हुए कार्यों को पूरा करने में मदद करता है।
पाठ करने की सही विधि (Puja Vidhi & Rituals)
इस Powerful Kavacham का फल प्राप्त करने के लिए कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- Sacred Time: इसका पाठ करने के लिए मंगलवार (Tuesday) या शनिवार (Saturday) का दिन सबसे उत्तम है।
- Purity: लाल वस्त्र धारण करें और हनुमान जी की मूर्ति के सामने घी का पंचमुखी दीपक जलाएं।
- Offerings: हनुमान जी को सिंदूर, लाल फूल और गुड़-चने का भोग लगाएं।
- Consistency: यदि आप किसी विशेष कार्य की सिद्धि चाहते हैं, तो 11 दिनों तक लगातार 11 बार इसका पाठ करना एक Life-changing ritual हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (5 Essential FAQs)
ग्यारह मुखी हनुमान जी के ग्यारह मुख किसका प्रतीक हैं?
इनके ग्यारह मुख ग्यारह रुद्रों (Lord Shiva’s forms) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो संहार और सुरक्षा दोनों की शक्ति रखते हैं।
क्या घर में ग्यारह मुखी हनुमान की फोटो रखना सुरक्षित है?
जी हाँ, घर में ग्यारह मुखी हनुमान (Shri Ekadasa Mukha Hanuman) की तस्वीर लगाना अत्यंत शुभ है। यह घर के Vastu Dosha को दूर करता है और परिवार को बुरी नजर (Evil Eye) से बचाता है।
क्या यह कवच पंचमुखी हनुमान कवच से अधिक शक्तिशाली है?
प्रत्येक कवच का अपना महत्व है, लेकिन Ekadasa Mukha Kavacham को अधिक व्यापक माना जाता है क्योंकि इसमें ब्रह्मांड की ग्यारह प्रमुख शक्तियों का समावेश है।
क्या महिलाएं इस कवच का पाठ कर सकती हैं?
बिल्कुल, महिलाएं पूरी श्रद्धा और स्वच्छता के साथ इसका पाठ कर सकती हैं। यह उन्हें Fearlessness और शक्ति प्रदान करता है।
इस कवच का पाठ किस समय करना चाहिए?
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या काल में हनुमान चालीसा के पाठ के बाद इसे पढ़ना सबसे अधिक Effective माना जाता है।
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