Shodshopachar Shri Ram Puja: भगवान श्रीराम मर्यादा, धर्म, करुणा और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। सनातन धर्म में उनकी पूजा विशेष श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है। षोडशोपचार श्रीराम पूजा एक ऐसी पूर्ण वैदिक पद्धति है, जिसमें भगवान की 16 प्रकार की सेवाओं (उपचारों) द्वारा पूजा की जाती है। यह पूजा न केवल आध्यात्मिक उन्नति देती है, बल्कि गृहस्थ जीवन में शांति, संस्कार और धर्म की स्थापना भी करती है।
षोडशोपचार पूजा क्या होती है?
षोडशोपचार का अर्थ है –
षोडश (16) + उपचार (सेवाएँ)
अर्थात भगवान को 16 चरणों में सेवा अर्पित करना।
यह पूजा पद्धति वैदिक काल से चली आ रही है और इसे पूर्ण, शुद्ध और सिद्ध पूजा विधि माना जाता है।
श्रीराम पूजा के लिए आवश्यक सामग्री:

श्रीराम की षोडशोपचार पूजा से पहले निम्न सामग्री एकत्र कर लें:
- श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की मूर्ति या चित्र
- स्वच्छ चौकी व लाल/पीला वस्त्र
- गंगाजल या शुद्ध जल
- पुष्प (कमल, गुलाब, चमेली)
- धूप, दीप, कपूर
- चंदन, रोली, अक्षत
- फल, मिष्ठान, पंचामृत
- तुलसी दल
- नैवेद्य (खीर, फल, मिठाई)
- अगरबत्ती, घंटी
- रामचरितमानस या श्रीराम स्तुति
षोडशोपचार श्रीराम पूजा की संपूर्ण विधि
पुनः संकल्प (संकल्प)
पूर्वोक्त एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ मम सङ्कल्पित मनोवाञ्छाफल सिद्ध्यर्थं इष्टकाम्यार्थसिद्ध्यर्थं पुरुषसूक्त विधानेन श्री रामचन्द्र स्वामि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥
पूर्व में वर्णित गुणों और विशेषताओं से युक्त इस शुभ तिथि पर, अपनी मनचाही मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए, मैं ‘पुरुष सूक्त’ के विधान से श्री रामचंद्र स्वामी की षोडशोपचार पूजा करूँगा।
प्राणप्रतिष्ठा (देवता को स्थापित करना)
(मन्त्रों का भाव): ओं असु॑नीते॒ पुन॑र॒स्मासु॒ चक्षु॒:
पुन॑: प्रा॒णमि॒ह नो᳚ धेहि॒ भोग᳚म् ।
ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑मु॒च्चर᳚न्त॒
मनु॑मते मृ॒डया᳚ नः स्व॒स्ति ॥
अ॒मृतं॒ वै प्रा॒णा अ॒मृत॒माप॑:
प्रा॒णाने॒व य॑थास्था॒नमुप॑ह्वयते ॥
श्रीरामाऽऽगच्छ भगवन् रघुवीर नृपोत्तम ।
जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ॥
रामचन्द्र महेष्वास रावणान्तक राघव ।
यावत्पूजां करिष्यामि तावत्त्वं सन्निधो भव ॥
अस्मिन् बिम्बे साङ्गं सायुधं सशक्तिं पत्नीपुत्र परिवार समेत श्री जानकी सहित श्री रामचन्द्र स्वामिनं आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि ।
हे प्रभु! आप हमारे नेत्रों और प्राणों में पुनः प्रतिष्ठित हों। हम सूर्य को उदित होते हुए देखें। आप हमें कल्याण और स्वस्ति प्रदान करें। अमृत ही प्राण है, जल ही अमृत है। मैं इन प्राणों को यथास्थान बुलाता हूँ। हे रघुवीर! हे नृपोत्तम! हे श्री राम! आप पधारें। हे राजेन्द्र! माता जानकी के साथ आप यहाँ सदैव स्थिर होकर विराजिए। हे रावण का अंत करने वाले राघव! जब तक मैं पूजा करूँ, तब तक आप यहाँ सान्निध्य बनाए रखें।
ध्यानम् (ध्यान)
कालाभोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितं
मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं हस्ताम्बुजं जानुनि ।
सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवं
पश्यन्तं मुकुटाङ्गदादिविविधाकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे ॥ १ ॥
वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्टपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने सुस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम् ॥ २ ॥
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतं
श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम् ।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम् ॥ ३ ॥
ओं रां रामाय नमः ध्यायामि । ध्यानम् समर्पयामि ॥
- जिनका रंग काले बादल के समान सुंदर है, जो सदा वीरासन में विराजमान हैं, जो एक हाथ से ज्ञानमुद्रा धारण किए हैं और दूसरा हाथ घुटने पर रखे हैं; जिनके बगल में बिजली के समान चमक वाली माता सीता कमल धारण किए बैठी हैं; उन मुकुट और बाजूबंद आदि आभूषणों से सुशोभित राघव का मैं भजन करता हूँ।
- जो स्वर्ण के महामंडप में कल्पवृक्ष के नीचे मणियों से जड़े पुष्पक विमान के आसन पर वीरासन में स्थित हैं; जिनके सामने पवनपुत्र हनुमान मुनियों को परम तत्व की व्याख्या सुना रहे हैं और जो भरत आदि भाइयों से घिरे हुए हैं, उन श्याम वर्ण राम का मैं भजन करता हूँ।
- जिनके नेत्र लाल कमल की पंखुड़ियों के समान सुंदर हैं, जो पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं, प्रसन्न मुख वाले, माता सीता से सुशोभित, करुणा के सागर और विष्णु-शिव आदि द्वारा सेवित उन श्री राम को मैं नमस्कार करता हूँ। ॐ रां रामाय नमः। ध्यानं समर्पयामि। (मैं ध्यान समर्पित करता हूँ)
1. आवाहनम् (बुलाना)
(पुरुष सूक्त मंत्र: स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः ।
स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् ।
स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा ।
अत्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम् ।
आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् ।
कौसल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥
ओं रां रामाय नमः आवाहयामि ।)
हे विश्व के स्वामी, जानकी के प्रिय, सर्वव्यापी, माता कौशल्या के पुत्र, प्रकृति से परे भगवान विष्णु स्वरूप श्री राम! मैं आपका आवाहन करता हूँ। ॐ रां रामाय नमः। आवाहयामि।
2. आसनम् (बैठने के लिए स्थान)
पुरुष सूक्त मंत्र:
पुरु॑ष ए॒वेदग्ं सर्वम्᳚ ।
यद्भू॒तं यच्च॒ भव्यम्᳚ ।
उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नः ।
यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति ।
राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते ।
रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥
ओं रां रामाय नमः नवरत्नखचित सुवर्ण सिंहासनं समर्पयामि ।
हे राजाधिराज, हे राजेंद्र राम! मैं आपको यह रत्नजड़ित सिंहासन दे रहा हूँ, इसे स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। नवरत्नखचित सुवर्ण सिंहासनं समर्पयामि।
3. पाद्यम् (पैर धोने के लिए जल)
पुरुष सूक्त मंत्र:
ए॒तावा॑नस्य महि॒मा ।
अतो॒ ज्यायाग्॑श्च॒ पूरु॑षः ।
पादो᳚ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ ।
त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि ।
त्रैलोक्यपावनाऽनन्त नमस्ते रघुनायक ।
पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन ॥
ओं रां रामाय नमः पादयो पाद्यं समर्पयामि ।
तीनों लोकों को पवित्र करने वाले, हे रघुनायक! आपको नमस्कार है। हे कमल नयन राजर्षि! चरणों को धोने के लिए जल स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। पादयो पाद्यं समर्पयामि।
4. अर्घ्यम् (हाथ धोने/सम्मान के लिए जल)
पुरुष सूक्त मंत्र:
त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः ।
पादो᳚ऽस्ये॒हाऽऽभ॑वा॒त्पुन॑: ।
ततो॒ विष्व॒ङ्व्य॑क्रामत् ।
सा॒श॒ना॒न॒श॒ने अ॒भि ।
परिपूर्ण परानन्द नमो रामाय वेधसे ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥
ओं रां रामाय नमः हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि ।
हे परिपूर्ण परमानंद! विधाता स्वरूप राम को नमस्कार। मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि।
5. आचमनीयम् (मुख शुद्धि के लिए जल)
पुरुष सूक्त मंत्र:
तस्मा᳚द्वि॒राड॑जायत ।
वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः ।
स जा॒तो अत्य॑रिच्यत ।
प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः ।
नमः सत्याय शुद्धाय नित्याय ज्ञानरूपिणे ।
गृहाणाचमनं राम सर्वलोकैकनायक ॥
ओं रां रामाय नमः मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
सत्य स्वरूप, शुद्ध, नित्य और ज्ञान स्वरूप, संपूर्ण लोकों के एकमात्र नायक श्री राम! आचमन के लिए जल स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। मुखे आचमनीयं समर्पयामि।
6. मधुपर्कम् (शहद, दही और घी का मिश्रण)
नमः श्रीवासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे ।
मधुपर्कं गृहाणेदं जानकीपतये नमः ॥
ओं रां रामाय नमः मधुपर्कं समर्पयामि ।
हे वासुदेव! हे ज्ञान स्वरूप! जानकी के पति, आपको नमस्कार है। इस मधुपर्क को स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। मधुपर्कं समर्पयामि।
7. स्नानम् (स्नान)
पुरुष सूक्त मंत्र:
यत्पुरु॑षेण ह॒विषा᳚ ।
दे॒वा य॒ज्ञमत॑न्वत ।
व॒स॒न्तो अ॑स्यासी॒दाज्यम्᳚ ।
ग्री॒ष्म इ॒ध्मश्श॒रद्ध॒विः ।
ब्रहाण्डोदरमध्यस्थैः तीर्थैश्च रघुनन्दन ।
स्नापयिष्याम्यहं भक्त्या त्वं प्रसीद जनार्दन ॥
ओं रां रामाय नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।
स्नानानन्तरं शुद्ध आचमनीयं समर्पयामि ।
हे रघुनन्दन! ब्रह्मांड के सभी तीर्थों के जल से मैं भक्तिपूर्वक आपको स्नान कराता हूँ। हे जनार्दन! प्रसन्न होइए। ॐ रां रामाय नमः। शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
8. वस्त्रम् (वस्त्र अर्पण)
पुरुष सूक्त मंत्र:
स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॑: ।
त्रिः स॒प्त स॒मिध॑: कृ॒ताः ।
दे॒वा यद्य॒ज्ञं त॑न्वा॒नाः ।
अब॑ध्न॒न्पुरु॑षं प॒शुम् ।
तप्तकाञ्चनसङ्काशं पीताम्बरमिदं हरे ।
सङ्गृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥
ओं रां रामाय नमः वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।
हे हरि! तपाये हुए सोने के समान चमक वाले इस पीतांबर (पीले वस्त्र) को स्वीकार करें। हे जगन्नाथ रामचंद्र! आपको नमस्कार है। ॐ रां रामाय नमः। वस्त्रयुग्मं समर्पयामि।
9. यज्ञोपवीतम् (जनेऊ)
पुरुष सूक्त मंत्र:
तं य॒ज्ञं ब॒र्हिषि॒ प्रौक्षन्॑ ।
पुरु॑षं जा॒तम॑ग्र॒तः ।
तेन॑ दे॒वा अय॑जन्त ।
सा॒ध्या ऋष॑यश्च॒ ये ।
श्रीरामाऽच्युत देवेश श्रीधराऽनन्त राघव ।
ब्रह्मसूत्रं चोत्तरीयं गृहाण रघुनन्दन ॥
ओं रां रामाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि । हे अच्युत! हे देवेश! हे श्रीधर! अनंत राघव! यह यज्ञोपवीत और उत्तरीय वस्त्र ग्रहण करें। ॐ रां रामाय नमः। यज्ञोपवीतं समर्पयामि।
10. गन्धम् (चंदन)
पुरुष सूक्त मंत्र:
तस्मा᳚द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑: ।
सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम् ।
प॒शूग्स्ताग्श्च॑क्रे वाय॒व्यान्॑ ।
आ॒र॒ण्यान्ग्रा॒म्याश्च॒ ये ।
कुङ्कुमागरु कस्तूरी कर्पूरोन्मिश्रचन्दनम् ।
तुभ्यं दास्यामि राजेन्द्र श्रीराम स्वीकुरु प्रभो ॥
ओं रां रामाय नमः दिव्य श्री चन्दनं समर्पयामि ।
केसर, अगरु, कस्तूरी और कपूर मिश्रित यह दिव्य चंदन मैं आपको अर्पित करता हूँ। हे राजेंद्र! इसे स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। दिव्य श्री चन्दनं समर्पयामि।
11. आभरणम् (आभूषण)
पुरुष सूक्त मंत्र:
तस्मा᳚द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑: ।
ऋच॒: सामा॑नि जज्ञिरे ।
छन्दाग्ं॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा᳚त् ।
यजु॒स्तस्मा॑दजायत ।
किरीटादीनि राजेन्द्र हंसकान्तानि राघव ।
विभूषणानि धृत्वाद्य शोभस्व सह सीतया ॥
ओं रां रामाय नमः सुवर्णाभरणानि समर्पयामि ।
हे प्रभु! अपनी इच्छा के अनुसार विभिन्न प्रकार के आभूषण ग्रहण करें। (यहाँ अंग-पूजा भी की जाती है: हृदय, कंठ, मुख, नेत्र, ललाट और शिर की पूजा)
आभरणम् –
तस्मा᳚द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑: ।
ऋच॒: सामा॑नि जज्ञिरे ।
छन्दाग्ं॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा᳚त् ।
यजु॒स्तस्मा॑दजायत ।
किरीटादीनि राजेन्द्र हंसकान्तानि राघव ।
विभूषणानि धृत्वाद्य शोभस्व सह सीतया ॥
ओं रां रामाय नमः सुवर्णाभरणानि समर्पयामि ।
अक्षतान् –
अक्षतान् कुङ्कुमोपेतान् अक्षय्यफलदायक ।
अर्पये तव पादाब्जे शालितण्डुल सम्भवान् ॥
ओं रां रामाय नमः अक्षतान् समर्पयामि ।
पुष्पाणि –
तस्मा॒दश्वा॑ अजायन्त ।
ये के चो॑भ॒याद॑तः ।
गावो॑ ह जज्ञिरे॒ तस्मा᳚त् ।
तस्मा᳚ज्जा॒ता अ॑जा॒वय॑: ।
तुलसी कुन्द मन्दार जाजी पुन्नाग चम्पकैः ।
कदम्ब करवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥
नीलाम्बुजैर्बिल्वपत्रैः पुष्पमाल्यैश्च राघव ।
पूजयिष्याम्यहं भक्त्या गृहाण त्वं जनार्दन ॥
ओं रां रामाय नमः नानाविध परिमल पत्र पुष्पाणि समर्पयामि ।
अथ अङ्गपूजा –
ओं श्रीरामचन्द्राय नमः – पादौ पूजयामि ।
ओं विश्वमूर्तये नमः – गुल्फौ पूजयामि ।
ओं विश्वरूपाय नमः – जङ्घे पूजयामि ।
ओं रघूद्वहाय नमः – जानुनी पूजयामि ।
ओं रावणान्तकाय नमः – ऊरू पूजयामि ।
ओं लक्ष्मणाग्रजाय नमः – कटिं पूजयामि ।
ओं पद्मनाभाय नमः – नाभिं पूजयामि ।
ओं दामोदराय नमः – उदरं पूजयामि ।
ओं विश्वामित्रप्रियाय नमः – वक्षःस्थलं पूजयामि ।
ओं सर्वास्त्रधारिणे नमः – बाहून् पूजयामि ।
ओं परमात्मने नमः – हृदयं पूजयामि ।
ओं श्रीकण्ठाय नमः – कण्ठं पूजयामि ।
ओं वाचस्पतये नमः – मुखं पूजयामि ।
ओं राजीवलोचनाय नमः – नेत्रौ पूजयामि ।
ओं सीतापतये नमः – ललाटं पूजयामि ।
ओं ज्ञानगम्याय नमः – शिरः पूजयामि ।
ओं सर्वात्मने नमः – सर्वाण्यङ्गानि पूजयामि ।
अथ अष्टोत्तरशतनाम पूजा –
श्री राम अष्टोत्तरशतनामावली पश्यतु ।
श्री सीता अष्टोत्तरशतनामावली पश्यतु ।
ओं रां रामाय नमः अष्टोत्तरशतनाम पूजां समर्पयामि ।
12. धूपम् (सुगंधित धूआं)
पुरुष सूक्त मंत्र:
यत्पुरु॑षं॒ व्य॑दधुः ।
क॒ति॒धा व्य॑कल्पयन् ।
मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू ।
कावू॒रू पादा॑वुच्येते ।
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
रामचन्द्र महीपालो धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
ओं रां रामाय नमः धूपं आघ्रापयामि ।
वनस्पतियों के रस से उत्पन्न, यह उत्तम और सुगंधित धूप हे राजा रामचंद्र! आप ग्रहण करें। ॐ रां रामाय नमः। धूपं आघ्रापयामि।
13. दीपम् (दीपक)
पुरुष सूक्त मंत्र:
ब्रा॒ह्म॒णो᳚ऽस्य॒ मुख॑मासीत् ।
बा॒हू रा॑ज॒न्य॑: कृ॒तः ।
ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: ।
प॒द्भ्याग्ं शू॒द्रो अ॑जायत ।
ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय वेधसे ।
गृहाण दीपकं चैव त्रैलोक्य तिमिरापहम् ॥
ओं रां रामाय नमः दीपं दर्शयामि ।
हे प्रकाशों के स्वामी! हे विधाता राम! आपको नमस्कार। तीनों लोकों के अंधकार को दूर करने वाला यह दीपक स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। दीपं दर्शयामि।
14. नैवेद्यम् (भोग)
पुरुष सूक्त मंत्र:
च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तः ।
चक्षो॒: सूर्यो॑ अजायत ।
मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ ।
प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत ।
इदं दिव्यान्नममृतं रसैः षड्भिः समन्वितम् ।
रामचन्द्रेश नैवेद्यं सीतेश प्रतिगृह्यताम् ॥
ओं रां रामाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि ।
ओं भूर्भुव॒स्सुव॑: । तत्स॑वितु॒र्वरे᳚ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धी॒महि ।
धियो॒ यो न॑: प्रचो॒दया᳚त् ॥
सत्यं त्वा ऋतेन परिषिञ्चामि ।
(सायङ्काले – ऋतं त्वा सत्येन परिषिञ्चामि)
अमृतमस्तु । अ॒मृ॒तो॒प॒स्तर॑णमसि ।
ओं प्रा॒णाय॒ स्वाहा᳚ । ओं अ॒पा॒नाय॒ स्वाहा᳚ । ओं व्या॒नाय॒ स्वाहा᳚ ।
ओं उ॒दा॒नाय॒ स्वाहा᳚ । ओं स॒मा॒नाय॒ स्वाहा᳚ ।
मध्ये मध्ये पानीयं समर्पयामि । अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि ।
उत्तरापोशनं समर्पयामि । हस्तौ प्रक्षालयामि । पादौ प्रक्षालयामि । शुद्धाचमनीयं समर्पयामि ॥
हे रामचंद्र! हे सीतापति! छह रसों से युक्त यह दिव्य अमृत समान अन्न का भोग ग्रहण करें। (यहाँ प्राणाय स्वाहा आदि मंत्रों से आहुति दी जाती है) ॐ रां रामाय नमः। नैवेद्यं समर्पयामि।
15. ताम्बूलम् (पान)
पुरुष सूक्त मंत्र:
नाभ्या॑ आसीद॒न्तरि॑क्षम् ।
शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्तत ।
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिश॒: श्रोत्रा᳚त् ।
तथा॑ लो॒काग्ं अ॑कल्पयन् ।
नागवल्लीदलैर्युक्तं पूगीफलसमन्वितम् ।
ताम्बूलं गृह्यतां राम कर्पूरादिसमन्वितम् ॥
ओं रां रामाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।
पान के पत्तों, सुपारी और कपूर से युक्त यह ताम्बूल हे राम! आप ग्रहण करें। ॐ रां रामाय नमः। ताम्बूलं समर्पयामि।
16. नीराजनम् (आरती)
पुरुष सूक्त मंत्र:
वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्तम्᳚ ।
आ॒दि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑स॒स्तु पा॒रे ।
सर्वा॑णि रू॒पाणि॑ वि॒चित्य॒ धीर॑: ।
नामा॑नि कृ॒त्वाऽभि॒वद॒न्॒ यदास्ते᳚ ।
मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीय गुणात्मने ।
चक्रवर्ति तनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥
मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे ।
सङ्गृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥
ओं रां रामाय नमः कर्पूर नीराजनं समर्पयामि ।
नीराजनानन्तरं शुद्धाचमनीयं समर्पयामि । नमस्करोमि ।
कौशल देश के स्वामी, महान गुणों वाले, चक्रवर्ती के पुत्र और सम्राट श्री राम को मंगल हो। हे जगन्नाथ! यह कपूर की आरती स्वीकार करें। ॐ रां रामाय नमः। कर्पूर नीराजनं समर्पयामि।
मन्त्रपुष्पम् –
धा॒ता पु॒रस्ता॒द्यमु॑दाज॒हार॑ ।
श॒क्रः प्रवि॒द्वान्प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ।
तमे॒वं वि॒द्वान॒मृत॑ इ॒ह भ॑वति ।
नान्यः पन्था॒ अय॑नाय विद्यते ।
सर्वलोकशरण्याय रामचन्द्राय वेधसे ।
ब्रह्मानन्दैकरूपाय सीतायाः पतये नमः ॥
ओं रां रामाय नमः मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ।
आत्मप्रदक्षिण नमस्कारम् –
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ।
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भव ।
त्राहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात्कारुण्य भावेन रक्ष रक्ष जनार्दन ॥
ओं रां रामाय नमः आत्मप्रदक्षिण नमस्कारान् समर्पयामि ।
सर्वोपचाराः –
ओं रां रामाय नमः छत्रं आच्छादयामि ।
ओं रां रामाय नमः चामरैर्वीजयामि ।
ओं रां रामाय नमः नृत्यं दर्शयामि ।
ओं रां रामाय नमः गीतं श्रावयामि ।
ओं रां रामाय नमः आन्दोलिकान्नारोहयामि ।
ओं रां रामाय नमः अश्वानारोहयामि ।
ओं रां रामाय नमः गजानारोहयामि ।
ओं रां रामाय नमः समस्त राजोपचारान् देवोपचारान् समर्पयामि ।
प्रार्थना –
श्रीरामचन्द्र रघुपुङ्गव राजवर्य
राजेन्द्र राम रघुनायक राघवेश ।
राजाधिराज रघुनन्दन रामचन्द्र
दासोऽहमद्य भवतः शरणागतोऽस्मि ॥
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥
श्रीरामचन्द्र चरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्र चरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्र चरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्र चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥
क्षमा प्रार्थना –
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तमा ।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व पुरुषोत्तमा ।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दना ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तुते ।
अनया पुरुषसूक्त विधान पूर्वक ध्यान आवाहनादि षोडशोपचार पूजया भगवान् सर्वात्मकः श्री जानकी सहित श्री रामचन्द्र स्वामि सुप्रीता सुप्रसन्ना वरदा भवन्तु ॥
तीर्थप्रसाद ग्रहणम् –
अकालमृत्यहरणं सर्वव्याधिनिवारणम् ।
समस्तपापक्षयकरं श्री रामचन्द्र पादोदकं पावनं शुभम् ॥
ओं रां रामाय नमः प्रसादं शिरसा गृह्णामि ।
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
समाप्ति: मन्त्रपुष्प अर्पित किया जाता है, प्रदक्षिणा की जाती है और क्षमा प्रार्थना के साथ पूजा संपन्न होती है।
श्रीराम षोडशोपचार पूजा के लाभ
- घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा
- जीवन में मर्यादा, अनुशासन और धर्म की स्थापना
- मानसिक तनाव और भय से मुक्ति
- संतान संस्कारों में वृद्धि
- पितृ दोष व गृह क्लेश में शांति
- राम कृपा से सुख, समृद्धि और यश
श्रीराम पूजा का शुभ समय
- राम नवमी
- एकादशी
- पूर्णिमा
- मंगलवार या गुरुवार
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल श्रेष्ठ
घर पर षोडशोपचार पूजा करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
- शुद्धता और श्रद्धा अनिवार्य
- पूजा से पूर्व स्नान करें
- तुलसी बिना धोए न चढ़ाएं
- मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें
- पूजा को बोझ नहीं, सेवा भाव से करें
FAQs: श्रीराम षोडशोपचार पूजा
श्री राम षोडशोपचार पूजा क्या है?
षोडशोपचार पूजा भगवान श्री राम की आराधना की एक पारंपरिक विधि है जिसमें 16 विशिष्ट चरणों (उपचारों) का पालन किया जाता है। ‘षोडश’ का अर्थ है 16 और ‘उपचार’ का अर्थ है सेवा या अर्पण। इसमें आवाहन से लेकर आरती तक की प्रक्रिया शामिल होती है, जो भक्त और भगवान के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है।
षोडशोपचार पूजा के 16 चरण कौन से हैं?
इस पूजा में मुख्य रूप से निम्नलिखित 16 सेवाएं अर्पित की जाती हैं:
आवाहन 2. आसन 3. पाद्य 4. अर्घ्य 5. आचमन 6. मधुपर्क 7. स्नान 8. वस्त्र 9. यज्ञोपवीत 10. गंध (चंदन) 11. पुष्प 12. धूप 13. दीप 14. नैवेद्य 15. तांबूल 16. प्रदक्षिणा और आरती।
क्या इस पूजा में पुरुष सूक्त का प्रयोग अनिवार्य है?
हाँ, पारंपरिक रूप से श्री राम षोडशोपचार पूजा ‘पुरुष सूक्त’ के मंत्रों के साथ की जाती है। चूंकि भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है और पुरुष सूक्त ब्रह्मांडीय पुरुष (विष्णु) की स्तुति है, इसलिए प्रत्येक उपचार के साथ एक विशिष्ट वैदिक मंत्र का उच्चारण फलदायी माना जाता है।
श्री राम पूजा के लिए सबसे शुभ समय कौन सा है?
वैसे तो श्री राम की पूजा प्रतिदिन की जा सकती है, लेकिन राम नवमी (चैत्र मास), प्रत्येक महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी और पुनर्वसु नक्षत्र को यह पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। घर में सुख-शांति के लिए इसे प्रातः काल करना सर्वोत्तम है।
क्या इस पूजा को घर पर साधारण विधि से किया जा सकता है?
बिल्कुल। यदि आपके पास सभी सामग्री उपलब्ध न हो, तो आप ‘मानसोपचार पूजा’ (मन से अर्पण) कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण आपकी भक्ति और श्रद्धा है। आप प्रत्येक चरण का नाम लेकर भगवान को मानसिक रूप से वह वस्तु अर्पित कर सकते हैं।
श्री राम षोडशोपचार पूजा के क्या लाभ हैं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से की गई यह (Sri Rama Shodasopachara Puja) पूजा:
घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति लाती है।
पारिवारिक कलह को दूर कर रिश्तों में सामंजस्य बढ़ाती है।
भक्त को आत्मिक बल और मर्यादा पुरुषोत्तम राम जैसे आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देती है।
Table of Contents

